हिन्दुस्तान में एक जगह है कालाहांडी। अमेरिका की विदेश मंत्री कोंडालीजा राइस और राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने शायद ही इस जगह का नाम सुना हो। अगर सुना होता तो वो ये गैरजि़म्मेदाराना बात ना करते कि भारतीय ज्यादा खाना खा रहे है और भारत में बढ़ रही अनाज की मांग विश्व में बढ़ी खाद्या की कीमतों के लिए जि़म्मेदार है। इन दोनों महाश्यों को यकीनन उड़ीसा के कालाहांडी की वास्तविकताएं नहीं मालूम। वे नहीं जानते की सालों से कालाहांडी में लोग रोटी, चावल नहीं बल्कि आम की गुठलियां, बांस के छिलके, पत्तों और जड़ों को खाकर जिंदगी बसर करने को मजबूर है। भारत के एक ऐसे इलाके में जिन्दा रहने के लिए संघर्ष जहां के वािशन्दों को दाल–चावल और रोटी सपने में दिखते हैं। अमेरिका की विदेश मंत्री कोंडालीजा राइस और राटपति बुश भारत की शहरी तस्वीर को सरसरी तौर पर देखते होंगे। हालांकि हिन्दुस्तान के शहरों में भी रोटी के लिए संघर्ष करते इंसानों की कमी नहीं। भारतीय शहरों में दो वक्त की रोटी के लिए भीख मांगते लोगों की भरमार है। ऐसे में विकास के इस दौर में भारतीय समाज की दो तस्वीरे उभर कर सामने आ रही हैं। पहली, जहां विव के सबसे अमीर लोग बसते हैं और दूसरी, यहां गरीबी ढूंढने निकलो तो चप्पे चप्पे पर भूखमरी, सूखा और अकाल से तड़पते और जिंदगी को घसीटते इंसान मिल जाएंगे। इसी देश में विव के टॉप टेन अमीरों में एक दो का नाम शमिल जरूर होता होगा लेकिन सच्चाई ये भी है कि 77 फीसदी आबादी रोजाना 20 रूपये से कम में गुजारा करने के लिए विवा है। ये तथ्य हालही में अजुर्न सेन गुप्ता आयोग की रिपोर्ट ने पेश किए है। कोंडालीजा राइस से पूछा जाए कि 20 रूपये में नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या?
चारों ओर शोर है। भारत का विकास हो रहा है। सरकार चीख चीख कर बता रही है और शहरी लोग इसी भूलावे में जी रहे है। मैकडोनाल्ड और नरूलाज् जैसे रेस्टारॉ में जाकर शौकीयाना भूख मिटाने वाला तबका कितना बड़ा है। कुछ बड़े मेट्रो शहरों की बात न करके कुछ छोटे कस्बों और गांव देहातों की ओर रूख करें तो वहां मजदूर और किसान 12 घंटे कड़ी मेहनत करके 40–50 रूपये कमा पाते है। दूसरी अहम बात कि रोजाना काम मिल जाए तो गनीमत। दरअसल देश की वास्तविकता कुछ और बयां करती है लेकिन विदेशों में सिफर् हमारी चकाचौंध अर्थव्यवस्था डंका पिटा जा रहा हे।
अर्थव्यवस्था भले ही छलांगे मार रही हो मगर यहां गरीबों को भला नहीं होता। एक अनुमान के मुताबिक दुनियाभर में रोजाना तकरीबन अस्सी करोड़ 54 लाख से भी ज्यादा लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। भारत में हर चार में से एक आदमी रोजाना भूखा सोता है। अमेरिका में लाखों करोड़ों रूपये चॉकलेट और आइसक्रीम खाने में खर्च कर दिए जाते है।
संयुक्त राट्र ने भूखमरी की समस्या 2015 तक खत्म करने का संकल्प ले रखा है। केन्द्र सरकार ने भी 2010 तक विकराल होती इस समस्या को पूरी तरह रोकने का लक्ष्य रखा है। भारत में 3 साल से कम उम्र की आधे बच्चे कुपोषण का िशकार हो जाते है। जिन्हें भरपेट खाना नसीब नहीं होता....बुश साहब और मेडम कोन्डालीजा जी। आप कुछ चुनींदा शहरों को देखने के बजाय यहां के गांवा को देखिए उड़ीसा में लोग भूख से मरते है तो पंजाब और महाराट्र आदि के किसान कर्ज में डूब कर। और इस देश में कर्ज पेट भरने के लिए लिया जाता है।
एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में 2004 में 13.8 अरब डॉलर और 2007 में 15.2 अरब डॉलर का खर्च कुत्तें बिल्लियों के खाने पीने पर किया गया था। हिन्दुस्तान के हर बच्चे को दो वक्त की रोटी मिल जाए तो मैं खुदा को शुक्रगुजार रहूंगा। ऐसे में कोंडालीजा राइस और राटपति बुश हमारी थाली पर भी नज़र गड़ाए बैठे हैं।
फ्रेंकलिन निगम
आरजेड 173/284,
गीतांजलि पार्क
गली नम्बर 3,
सागरपुर वेस्ट, दिल्ली
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Friday, 9 May, 2008
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2 टिप्पणियाँ:
भाई फ्रेंकलिन, एक कटु सत्य का आभास हुआ आपका यह लेख पढ़कर. खाद्यान समस्या पर अमरीका की टिप्पणी एक कुतर्क से कम नहीं, जिसकी आड़ में अमरीका अपने आप को पाक-साफ़ घोषित करना चाहता है.
हमारे देश के विकास से साथ समस्या यह है कि विकास की खटारा गाड़ी को ड्राइवर सीट पर बैठकर चलाने के लिये हर कोई राजी है, पर पीछे से धक्का लगाने कोई नहीं आता!
सही है, अमरीकन टिप्पणी एक कुतर्क ही है.
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