Wednesday, 14 May, 2008

शालू..............


शालू
क्यों ....
हसती हो तुम इतना
क्यों...
बात–बेबात मुस्कुरा देती हो..
मैंने देखा है
कई बार
टेबिल पे
तुमको खामोश अपने आप में
खोया हुआ
कुछ उधेड बुन में लगी हुई
जैसे ...
तुम्हारे अंदर
एक कहानी घट रही हो..
कभी चुपचाप
सपने बुनती हो..
कभी खुद से बुदबुदाती हुई
ना जाने क्या कहती हो..
और
भीड़ में
भीड़ से परे अकेली होती हो...
शालू..
क्यों ....हसती हो तुम इतना
क्यों...बात–बेबात मुस्कुरा देती हो..

मैंने देखा है कई बार
टेबिल पे तुमको
आफिस के काम को
अपने पे हावी करते हुए...
चीखते चिल्लाते हुए..
और
अपनी ही भावनाओं से,
उलझते – सुलझते हुए...
तुम्हारी हंसी में
तुम्हारी मुस्कुराहट में
शालू..
कुछ छुपा है
क्यों ....हसती हो तुम इतना
क्यों...बात–बेबात मुस्कुरा देती हो....

मैंने देखा है कई बार
टेबिल पे तुमको
बिखरे हुए पन्नों के बीच
कुछ तलाशते हुए....
तुम जानती हो
वहां कुछ नहीं मिलेगा..
फिर भी ढुंढती हो
एक शब्द....प्यार
जो तुम्हारा हो.....
जिसे तुम लिख सको
मुट्ठी में भींच सको...
और
वे शब्द हवा में गुंजे उठे
तुम्हारे ठहाकों की तरह
मैंने देखा है कई बार
टेबिल पे तुमको उदास ..
हंसते हुए....

(दोस्त शालिनी के नाम....)

2 टिप्पणियाँ:

Keerti Vaidya said...

wah......iam speachless.....

मीत said...

क्या बात है. बहुत बढ़िया.