फ्रेंकलिन निगम
पुलिस हिरासत में मौंतें, आत्महत्याएं और बलात्कार जैसे सैकड़ों दर्ज़ मामले पुलिसिया जु़ल्म और प्रताड़ना की छोटी-सी कहानी बयां करते हैं। हकीकत में पुलिस उत्पीड़न की अनगिनत मामले तो कहीं दर्ज़ ही नहीं होते। हर रोज़ देशभर के थानों में अनगिनत लोग पूछताछ के बहाने प्रताड़ना झेलते हैं। क्योंकि प्रताड़ना झेलने वाले ये लोग जिंदा बच जाते है इसलिए इनका नाम आंकड़ों की फेहरिस्त में शामिल नहीं होता।
पुलिस हिरासत में प्रताड़ना के मामले पर एशियन सेंटर फॉर ह्युमेन राइट्स ने टॉरचर इन इंडिया 2009 रिपोर्ट जून में प्रकाशित की। ये रिपोर्ट पुलिस हिरासत में मौत, गुनाह तक प्रताड़ना, महिलाओं और बच्चों का उत्पीड़न जैसे पुलिसिया जुल्म के कई पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डालती है। टॉरचर इन इंडिया 2009 रिपोर्ट में उदाहरण के तौर पर लिए गए तमाम मामले देशभर की अदालतों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष विचाराधीन हैं।
1 अप्रैल 2001 से 31 मार्च 2009 तक पुलिस में हिरासत 1,184 लोगों की मौत की शिकायतें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को मिली। हिरासत में मारे गए तमाम मौतों का एक बड़ा कारण यातना रहा है। ज्यादातर मौते पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने के 48 घंटे के भीतर हुई।
1 अप्रैल 2001 से 31 मार्च 2009 की अवधि में सबसे ज्यादा पुलिस हिरासत में मौत के मामले महाराष्ट्र 192 और उत्तर प्रदेश में 128 मामले दर्ज़ हुए। इसके बाद गुजरात 113, ऑध्र प्रदेश 85, पश्चिम बंगाल 83, तमिलनाडु 76, असम 74, कर्नाटक 55, पंजाब 41, मध्य प्रदेश 38, बिहार और राजस्थान 32, हरियाणा 31, केरल 30, झारखंड 29, दिल्ली 25, उड़ीसा 24, छत्तीसगढ़ 23, उत्तराखंड और मेघालय 16, अरुणाचल प्रदेश 11, जम्मू और कश्मीर तथा त्रिपुरा 9, पुडुचेरी और चंडीगढ़ 3, हिमाचल प्रदेश 2, मणिपुर, गोवा, सििक्कम और दादर और नगर हवेली में एक-एक मामले दर्ज किए गए।
उपर दिए गए आंकड़ों में सशस्त्र बलों की हिरासत में मरने वालों की संख्या शामिल नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2007-08 में पुलिस की हिरासत में हुई मौतों की संख्या 188 थी जबकि यह आँकड़ा वर्ष 2006-07 में 118 था। वर्ष 2004-05 में यह संख्या 136 थी।
हिरासत में हुई 118 मौतों मे से 61 की मजिस्ट्रेट जांच और 12 मामलों की न्यायिक जाचं का आदेश दिया गया। 57 मामलों में पुलिसवालों के खिलाफ मामला दर्ज़ किया गया और 35 पुलिसवालों पर चार्ज शीट दायर की गयी। 2007 में किसी भी पुलिसवाले के हिरासत में मौतों के लिए दोशी नहीं ठहराया जा सका
पुलिस हिरासत में मौतों की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र, 14 दिसम्बर 1993 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सभी जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस सुपरिटेंडंटों को दिशा-निर्देश जारी कर कहा था कि पुलिस हिरासत में होने वाली मौत और बलात्कार की किसी भी घटना की जानकारी 24 घंटे के अंदर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सेक्रेटरी जनरल को देनी होगी। गौरतबल है कि साल 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने भी डीके बसु मामले में फैसला सुनाते हुए किसी अभियुक्त की गिरफ्तारी और पूछताछ के समय उसके मानवाधिकार संरक्षित करने के लिए दस दिशा-निर्देश तय किए थे। जिनके मुताबिक पुलिस बग्ौर वॉरेंट के किसी व्यक्ति को उस समय गिरफ्तार कर सकती है, जब उसके सामने संज्ञेय अपराध किया गया हो। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ सात साल तक के कारावास से दंडनीय अपराध करने का आरोप हो, तो नए संशोधन के मुताबिक पुलिस उसे केवल तब गिरफ्तार कर सकती है, जब उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उसके पास विश्वास करने का पर्याप्त कारण हो कि उसने अपराध किया है तथा इसके अलावा पुलिस अधिकारी इस तथ्य से संतुष्ट हो कि आरोपी को अपराध की पुनरावृत्ति करने से रोकने के लिए, या अपराध की तफ्तीश के लिए या साक्ष्य को नष्ट करने से बचाने के लिए या अदालत में अभियुक्त की हाजिरी सुनिश्चित करने के लिए उसकी गिरफ्तारी जरूरी है।
एशियनसेंटर फॉर ह्युूमेन राइट्स की रिपोर्ट बताती है कि गिरफ्तारी के लिए तय किए गए दिशा निर्देशों की अवहेलना कर पुलिस किसी भी व्यक्ति को पूछताछ के लिए थाने बुला लेती है और अवैध रूप से हिरासत में रखकर मानसिक शारिरिक प्रताड़ना देती है।
गृह मंत्रालय ने भी उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार सभी राज्यों को महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी कर कहा था कि सभी प्रशासनों को गिरफ्तारियों के समय इनका पालन करना होगा। लेकिन हकीकत ये है गिरफ्तारी के दौरान इन दिशा निर्देशों को पालन नहीं किया जाता।
पुलिस की कार्रवाई का ये आम तरीका है कि गिरफ्तारी की तारीख को वे अपनी सुविधानुसार दर्ज़ करती है। उदाहरण के लिए ऐसे केसों को रिपोर्ट में पेश किया गया है। जिस व्यक्ति को गिरफ्तार पहले कर लिया गया था और उसकी गिरफ्तारी एक दिन बाद दिखायी गयी।
देश में हिरासत में होने वाली मौतों में लगातार बढ़ोतरी के मद्देनजर केन्द्रीय गृह म्ॉत्रालय ने सभी राज्य सरकारों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों को दिशा-निर्देश जारी कर इस प्रकार के किसी भी मामले की सूचना 24 घ्ॉटे के भीतर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को देने को कहा था। हिरासत में मौत के मामले में 24 घंटे के अंदर लाश का पोस्टमॉर्टम कराना होगा। सीआरपीसी की धारा 176 में पहले ही घंटे संशोधन करके यह व्यवस्था की गई है कि पुलिस हिरासत के दौरान किसी व्यक्ति की मौत, लापता होने या किसी महिला के बलात्कार की स्थिति में मामले की न्यायिक जाँच अनिवार्य होगी।
हिरासत में दी जाने वाली यातनाओं से जुड़ी घटनाओं में हर साल इजाफा होता जा रहा है। पुलिस, अर्धसैनिक बल और सेना में उत्पीड़न, हिरासत में मौत और फर्जी मुठभेड़ों के मामले लगातार बढे़ हैं। इन दिनों मणिपुर, पिश्चम बंगाल, जम्मू कश्मीर जैस राज्यों मे अतिवाद, अलगावाद और नक्सलवाद के नाम पर आये दिन पुलिस की ज्यादतियां बढ़ती जा रही है। मणिपुर के लोग मणिपुर पुलिस कमांडो की यातनाओं और गिरफ्तारियों के खौफ में जी रहे है। तमाम घटनाओं पर नज़र डाले तो पुलिस, सेना और अर्द्धसैनिक बलों को अपराध की खुली छूट मिली हुई है।
उत्पीड़न का मामला भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में दंडनीय अपराध है। यदि यातना के दौरान गंभीर चोट आती है तो दोषी को 10 साल तक की सजा का प्रावधान है। लेकिन ज्यादातर मामलों में पुलिसवालों को सज़ा नहीं मिलती।
आज से करीब 30 साल पहले विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में मौत का शिकार होता है तो कानूनी रूप से इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार माना जाएगा। लेकिन इस सिफारिश को हम आज भी अपने कानूनी संशोधनों में शामिल नहीं कर सके हैं।
इस लेख को आप दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण (दिनांक 09अक्टूबर) में भी देख सकते हैं।
Friday 9 October 2009
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1 टिप्पणियाँ:
ये स्थिति वास्तव में इससे भी गंभीर है,क्यूंकि बहुत सटीक आंकडे कभी सामने आ ही नहीं पाते!.....
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