
सपना अखंड भारत का और राजनीति खंड-खंड भारत की। ये भारतीय राजनीति के दो विरोधाभासी पहलु है। इन दिनों मराठी अस्मिता और उत्तर भारतीय के मुद्दे पर राजनीति की बिसात बिछी है। हरेक राजनीतिक पार्टी अपनी अपनी बारी में पासे फैंकती हैं और चाले चलती हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिवसेना की क्षेत्रवाद की चाले जगजाहिर हैं। एक दूसरे की सख्त विरोधी दोनों पार्टियों का एजेंडा एक ही है। लेकिन आरएसएस और भाजपा की इस चाल की किसी को उम्मीद नहीं रही होगी। जब दोनो ने उत्तर भारतीय की सुरक्षा की बात कह डाली।
खैर समय समय पर उत्तर भारतीयों का विरोध, मराठी अस्मिता और क्षेत्रवाद से संबंधित खबरें चर्चा में रहती है। हालही में कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने टैक्सी परमिट के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता की बात की। तो आरएसएस और भाजपा ने मुंबई में उत्तर भारतीय की सुरक्षा की पैरवी की। कभी एक थाली के चट्टे-बट्टे रहे शिवसेना और भाजपा में तानातनी शुरू हो गयी। ऐसे और भी किस्से है जब मुख्यमंत्री शीला दीक्षित दिल्ली पर बढ़ते बोझ का दोष बाहरवालों के सिर मढ़ देती हैं। भारत की आईटी राजधानी बंगलौर में भी अंग्रेजी विरोधी संगठन सक्रिय हैं। वहां भी गैर कन्नड़वाद का विरोध अक्सर होता रहता है। बंगलौर में ये हवा है गैर-कन्नड़ भाषी लोगों की बढ़ती आबादी के चलते कर्नाटक की राज्यभाषा कन्नड़ का अपमान हो रहा है।
ये तमाम घटनाएं और राजनीति उस देश में हो रही है जिसके अंखड भारत होने की दुहाई दी जाती रही है। विकास के मामले में पिछड़े हुए राज्यों और गांव-देहात के लोग रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्य और शहरों का रूख करते हैं। ऐसा भी नहीं है कि खास किसी एक राज्य के लोग ही दूसरे राज्यों की ओर जाते है। बल्कि देश के कोने कोने से पूरे भारत में बिखरे पड़े है।
आजादी के समय 1947 में भारत की मात्र 15 प्रतिशत आबादी शहरी थी। अब यह लगभग 30 प्रतिशत हो गई है। अगले तीन दशकों में 50 प्रतिशत आबादी के शहरों में बसने का अनुमान है। बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा राज्य के लोग कृषि या उससे जुड़े कामधंधों के लिए विकसित राज्यों महाराष्ट्र, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों की तरफ बड़ी संख्या में रूख करते हैं। 2001 की रायशुमारी के मुताबिक केवल 4 प्रतिशत लोग ही स्थायी पलायन करते है। बाकी लोग सिर्फ कामधंधों की तलाश में ही दूसरे राज्यों को रूख करते हैं।
दिसंबर 2009 को नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन के राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि भारत में परिवर्तन कुछ हद तक धीमा जरूर है लेकिन अगले 20 वर्षो में शहरी जनसंख्या दोगुनी हो सकती है। गृह मंत्रालय के जनसंख्या विभाग के अनुसार 2025 तक पंजाब और हरियाणा में शहरीकरण 40-50 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। इन दोनों राज्यों में भी बड़ी संख्या में हर साल लोग कामधंधों की तलाश में आते हैं। सो, मांग आज शिवसेना और मनसे कर रहे है तो क्या कल पंजाब सिर्फ पंजाबियों और हरियाण, हरियाणवियों को हो जाएगा। ऐसे तो भारत नाम मात्र का बचेगा और ये देश अप्रत्यक्ष रूप खंड-खंड़ हो जाएगा।
बारीकि से देखा जाए तो अखंड भारत की मानसिकता ही खंड खंड नज़र आती है। बिहार के लोगों को बिहारी कह कर चिढ़ाया जाता है तो दक्षिण भारतीयों को मद्रासी कहकर। इस तरह की मानसिकता अनेकता में एकता वाली कहावत को झुठला देती है। देश के किसी भी राज्य का नागरिक अगर किसी दुसरे राज्य में जाकर काम-धंधा नहीं कर सकता तो तथाकथित एकता पर ही सवाल उठ जाएगा। जिस तरह महाराष्ट्र में क्षेत्रवाद का रायता राजनीति पार्टियों द्वारा फैलाया जा रहा है। वे भारत के भविष्य के लिए कई लिहाज से ठीक नहीं। आज ये मराठी मानुस की अस्मिता का सवाल है तो कल गुजराती, राजस्थानी, बंगाली, पंजाबी, पहाड़ी और दक्षिण भारतीय की अस्मिता का सवाल भी बन सकता।
शहरों में बढ़ती आबादी के चलते बुनियादी शहरी ढ़ांचे, अन्य सुविधाएं, हवा-पानी की गुणवत्ता, सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य सेवाएं, आवास, सामाजिक नेटवर्क, मनोरंजक सुविधाएं, संरचना और व्यक्तिगत सुरक्षा जैसे चुनौतियां हैं। लेकिन इन चुनौतियों का मतलब ये कतई नहीं होना चाहिए कि किसी को भी दूसरे राज्यों में जाकर काम करने की पाबंदी है। बढ़ते शहरीकरण से उभरते खतरों का समाधान तो केन्द्र और राज्य सरकारों को सही व्यवस्था से करना है।
भारत एक मोहल्ला है। इस मोहल्ले अनेकों घर है। मोहल्ले में कहीं भी जाने, रहने और काम करने की आज़ादी होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा तो मोहल्ला कई घरों या खंडों में बंट जाएगा। नागरिक कहां कौन सी भाषा बोले, कौन कहां रहेगा ये तमाम नियम राजनीतिक पार्टिया तय करेंगी या फिर हमारा संविधान?
वास्तविकता यह है कि सभी राजनैतिक पार्टीयां कम ....ज्यादा इस मे सहयोग दे रही हैं जिस का परिणाम अंतत: जनता को भुगतना पड़ेगा।देश को टुकड़ो मे बाँटने का काम सबसे पहले किसने किया यह सभी जानते हैं....अब वही चिंगारी आग बनने लगी है.....
प्रत्युत्तर देंहटाएंjo bhee likhaa hai, sahee hai
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