फ्रेंकलिन निगम
नब्बे के दशक में आर्थिक सुधारों की ट्रेन स्टार्ट हुई और महज बीस वर्षों में इसने ऐसी रफ्तार पकड़ ली कि देश का नक्शा ही बदल गया। तेज आर्थिक विकास, ग्लोबलाइजेशन और रोजगार के नए मौकों के उफान ने देश में नया आत्मविश्वास भरा, दुनिया ने नई नजर से हमें देखना शुरू किया और समाज की परंपरागत सोच का नजरिया भी परिवर्तन के नए चश्मे की तलाश करने लगा। लेकिन, तेज गति से आ रहे इस बदलाव में बहुत कुछ पीछे भी छूट गया।
मुलाकात ने पलटी तकदीर
बदलाव की इस बयार का सबसे बड़ा फायदा देश के अनेक छोटे शहरों को पहुंचा। शहरीकरण के तूफान में ये शहर रातोंरात चमचमाते महानगरों में तब्दील हो गए। मसलन, एक कहानी राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा के शहर गुड़गांव की। बारह साल पहले दुनिया की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक के सीईआ॓ जेक वेल्स और भारत की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ के चेयरमैन कुशाग्रपाल सिंह की एक मुलाकात हुई। इस मुलाकात ने पलट दी गुड़गांव की तकदीर। डीएलएफ ने गुड़गांव का पहला चमचमाता कमर्शियल सेंटर बनाया था और इस सेंटर की तलाश थी बड़ी कंपनियों की जो अपने कार्यस्थल यहां खोल सकें। जेक वेल्स अपनी कंपनी का ऑफिस यहां खोलने पर राजी हो गए। इसके बाद तो इतिहास ही बदल गया। एक से बढ़कर एक कंपनियों की यहां लाइन लग गई और देश की राजधानी से सटा यह उपनगर देखते ही देखते महानगर में तब्दील हो गया। यह कहानी दिल्ली से सटे नोएडा, पुणे, बेंगलुरू और हैदराबाद जैसे शहरों की भी है, आर्थिक सुधार से पहले ये कछुए की रफ्तार से आगे बढ़ रहे थे लेकिन आर्थिक सुधार की शुरूआत के बाद इन शहरों को पंख लग गए। अब बेंगलुरू को ही लीजिए...कभी ‘पेंशनर पैराडाइज’ के नाम से मशहूर शहर पिछले 15 साल से 11 फीसद की रफ्तार से बढ़ रहा है। हर साल नौकरी करने वालों की संख्या में 30 फीसद का इजाफा हो रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक नोएडा देश में सबसे तेजी से तरक्की करने वाले शहर में से एक है। पुणे की प्रति व्यक्ति आमदनी तो देश के औसत से 50 फीसद ज्यादा है। ये तमाम शहर गवाह हैं कि आर्थिक सुधार के बाद छोटे शहरों की तस्वीर बदल रही है।
शुरू हुईं दिक्कतें
उदारीकरण के बाद नए शहर बने और इनमें आकर लोग भी बसे। उघोगों और कम्पनियों को पनपने के लिए जमीन भी मिली लेकिन कुछ समस्या इन शहरों के सामने खड़ी हो गई। दिल्ली से सटे गुड़गांव को ही लीजिए, गुड़गांव में 10 से 12 घंटे की बिजली कटौती है तो पानी टैंकर पर हर परिवार को हर हफ्ते 500 से 600 रूपए खर्च करना पड़ता है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का नाम नहीं और कानून व्यवस्था की हालत में तेजी से गिरावट। इमारतों में तब्दील होते गुड़गांव की है। दूसरी मिसाल सिलिकन वैली के नाम से मशहूर बेंगलुरू शहर की है। यहां भी इंफ्रास्ट्रक्चर चरमरा गया है। ट्रैफिक जाम के चलते पांच किलोमीटर के सफर में डेढ़ घंटे लग जाते हैं। बिजली-पानी की भी भारी किल्लत है। बढ़ती आबादी के कारण बेंगलुरू की व्यवस्था चरमराने लगी है। उदारीकरण ने शहरों में रोजगार के अवसर तो पैदा किए लेकिन व्यवस्था की खामियों ने इन शहरों को संकट में डाल दिया है।
मोबाइल क्रांति
आर्थिक सुधारों की गति ने इंसान के आपसी कम्युनिकेशन की दुनिया में चमत्कार ला दिया। पहले खतों, पोस्टकार्डों से दूर के रिश्तेदारों का हालचाल लिया जाता था। इनमें महीनें, कभी-कभी तो सालों लग जाते थे। लेकिन उदारीकरण के दौर में मोबाइल क्रांति आई और दुनिया आ गई मुट्ठी में। आज देश में तकरीबन 56 करोड़ मोबाइल उपभोक्ता हैं। भारत मोबाइल उपभोक्ता के क्षेत्र में दूसरे स्थान के साथ विश्व का सबसे तेजी से उभरता हुआ दूरसंचार बाजार है। भारत में 13 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2013 तक भारत इंटरनेट यूजर्स के मामले में तीसरे स्थान पर होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व जनसंख्या रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में 2030 तक शहरी लोगों की तादाद देहाती लोगों से ज्यादा हो जाएगी। ये सब पिछले 20 सालों में आर्थिक सुधारों की नीतियों पर चलने से हुआ है। उदारीकरण से पनपे बाजारवाद के कारण हम सफलता के साथ विश्व में खड़े हैं। ये चमकते भारत की तस्वीर है।
एक भारत जो गरीब रह गया
शहरों की आ॓र उठती नजर, आर्थिक सुधारों की उजली तस्वीर देखती हैं। लेकिन पीछे मुड़कर गांवों की तरफ देखने पर नजारा कुछ और ही दिखता है। 90 के दशक के बाद भूमंडलीकरण और बाजारवाद की नीतियों ने खेती और उस पर निर्भर समाज के सामने चुनौती खड़ी कर दी हैं। ऐसे में देश के लिए यह चुनौती कम गंभीर नहीं हैं। जहां एक अरब से ज्यादा की आबादी में 65 फीसद लोगों की कमाई का मुख्य साधन खेती है। आर्थिक सुधारों ने एक वर्ग को नौकरियां दीं तो एक बड़ा तबका आज भी बेरोजगार है। देश की 77 फीसद आबादी रोजाना 20 रूपए से कम पर गुजारा कर रही है। कुछ ऐसी ही वास्तविकताएं हैं जो आर्थिक सुधारों की तस्वीर धुंधली कर देती हैं। उदारीकरण, बाजारीकरण और वैश्वीकरण की चकाचौंध में एक तबका हाशिए पर कहीं पीछे छूट गया है।
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