
खबरों का बाज़ार बेहद बड़ा है... इतना बड़ा कि हर सेकेंड में खबरें बुनी और उधेड़ी जाती हैं...और इस उधेड़-बुन में मीडिया का एक तबका चौबीसों घंटे पिला रहता है... मीडिया उभर चुका बाज़ार है और इस बाज़ार में सभी अपने दर्शक-पाठक तलाशने में जुटे हैं। ऐसी धारणा है कि खबरों से खास उम्र और तबके का ही सरोकार है... शायद इसलिए न्यूज़ चैनल दर्शकों की उम्र के लिहाज से खबरें दिखाते हैं... और यहां बच्चों के लिए कोई जगह नहीं होती...
तमाम तर्क को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल समय पर ‘‘खबरों की पाठशाला’’ नाम से बच्चों का न्यूज़ बुलेटिन दिखाया जा रहा है, जिसमें बच्चों द्वारा एंकरिंग और रिपोर्टिंग की जा रही है। दरअसल इस बुलेटिन का मकसद खबरों को बच्चों की नज़र से देखना है...
आज तमाम न्यूज़ चैनल दर्शकों को कई तरीकों से रिझाने में लगे हैं। राजनीतिक, सामाजिक, खेल, अपराध और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की खबरों को अपने दर्शकों के नज़रिए के अनुरूप पेश किया जाता है। कुछ चैनल युवाओं के लिए खबरों का मनोरंजनीकरण करते हैं, तो कुछ मनोरंजन का समाचारीकरण कर देते हैं... इसी खींचतान में किसी को इस बात की फिक्र ही नहीं कि खबरों के बाज़ारीकरण और ग्लैमराइजेशन का असर बच्चों के मन पर भी पड़ता होगा...
आम धारणा है कि खबरें बच्चे देखते नहीं... 6 से 16 साल के बच्चे न्यूज़ चैनलों की टीआरपी बढ़ाने वाले दर्शक नहीं होते... इसलिए तमाम न्यूज़ चैनल बच्चों को ध्यान में रखकर खबरें बनाते नहीं... लेकिन बच्चे भी हर मुद्दे पर कुछ कह सकते हैं और उनके मन में भी कई तरह की जिज्ञासाएं और सवाल उठते हैं। कई बार बच्चे अपने मां-बाप से किसी मुद्दे पर ऐसे सवाल पूछ लेते हैं और उनके मासूम सवालों का जवाब हमारे पास नहीं होता...या हम उनके सवालों को यह सोच कर टाल जाते हैं कि वह समझ नहीं पाएंगे... पिछले दिनों नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवानों को मार दिया... यह खबर तमाम चैनलों पर सनसनी की तरह पेश की गई... इस खबर पर एक छोटी-सी बच्ची ने पिता से कहा कि दुश्मनों ने लोगों को मार दिया है, उन्हें चोट लगी है...यह उस बच्ची की हिंसक खबर पर प्रतिक्रिया थी।
दरअसल बसों में, चाय की दुकानों पर, बीड़ियों-सिगरेट के धुएं के बीच और ऑफिसों में खबरों पर बात करते लोग मिल जाते हैं... महंगाई, राजनीति, हिंसक वारदातें, बाल मज़दूरी, अधिकार, स्कूली व्यवस्था, सामाजिक कुरीतियां और आतंकवाद ऐसे मामले हैं, जिन पर एक खास उम्र के लोग ही बात करते हैं। लेकिन इन तमाम मुद्दों से बच्चों का भी सरोकार होता है। मसलन महंगाई का असर सिर्फ उम्रदराज लोगों पर नहीं होता। महंगाई की मार बच्चे भी झेलते हैं। उनके खिलौने, कपड़े और किताबें महंगी हो जाती हैं तब वह क्या सोचते समझते हैं... इस खबर को अगर बच्चों की नज़र से देखा जाएगा तो समझना आसान होगा... और इसी का प्रयास है ‘‘खबरों की पाठशाला’’।
‘‘खबरों की पाठशाला’’ बुलेटिन की शुरुआत 1 अप्रैल को शिक्षा के अधिकार के मुद्दे से की गई, जिसमें बच्चे ही शिक्षा के अधिकार की बात कर रहे थे। इस बुलेटिन में एक प्रोफेशनल न्यूज़ बुलेटिन की तरह राजस्थान, झारखंड, लखनऊ, दिल्ली और छत्तीसगढ़ के शहरों से चाइल्ड रिपोर्टरों ने स्टूडियो में मौजूद चाइल्ड एंकर्स के साथ अधिकार, शिक्षा व्यवस्था, स्कूली सुविधाओं और खामियों पर अपने अनुभव के आधार पर बात की। इसके बाद सानिया-शोएब विवाद और नक्सलवाद पर भी चाइल्ड रिपोर्टर्स ने अपना नज़रिया रखा। दरअसल यह बच्चों को भी न्यूज चैनल से जोड़े जाने की पहल है... और जब हरेक खबर पर ढेरों विचार हवा में उछाले जा रहे हैं, तो ऐसे में बच्चे खबरों को किस नज़र से देखते हैं। यह जानने की कोशिश है ‘‘खबरों की पाठशाला’’।
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