पिछले दिनों हुई घटनाओं के बाद नक्सलवाद पर फिर गर्मागर्म बहस छिड़ गयी है। इसके पक्ष और विपक्ष पर बोलने वाले खुलकर सामने आने लगे हैं। इस मुद्दे पर बात करने वाले बुद्धिजीवियों में से एक गौतम नवलखा ने पिछले दिनों बस्तर जिले का दौरा किया। इस यात्रा के अनुभवों को जानने के लिऐ हमारे संवाददाता फ्रेंकलिन निगम ने उनसे लम्बी बातचीत की। इसी बातजीत के प्रमुख अंश..
आप अभी बस्तर से लौटे हैं। वहां की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति कैसी है। आखिर वहां की हकीकत क्या है?
संक्षिप्त में कहूं तो हालात अच्छे नहीं हैं। खासतौर से 2005 मे जब सलवा जुडूम शुरु हुआ तो हालात बिगड़ते चले गए। लोगों के सरोकार सरकारी नीतियों से इतने ज्यादा प्रभावित है कि जब तक उनमें कोई संशोधन नहीं होता तब तक मुझे हालात बदलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती।
सरकारी नीतियों से मेरा मतलब मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग कॉरपोरेशन और मिनरल इंडस्ट्री के साथ समझौतों के चलते जंगल से लोगों के विस्थापन के मामले से है। ये तमाम मुद्दे ज्वलंत मुद्दे बन चुके हैं। जब तक इनपर ठीक तरह से ध्यान नहीं दिया जाता तब तक स्थिति बेहतर होने की उम्मीद मुझे नजर नहीं आती।
सरकारी शह पर बने सलवा जुडूम का कहर आज भी उतना ही है या कुछ राजनैतिक दलों के नेताओ, मीडिया और मानवाधिकार संगठनों द्वारा आलोचना से इसके मकसद का पर्दाफाश होने के बाद कुछ कम हुआ है।
जाहिर है कि जितनी आलोचना और जितना खुलासा हुआ है। इसके बाद वे थोड़ा पीछे हटे हैं। लेकिन ये मान लेना कि खत्म हो गया है या खत्म कर दिया गया है तो अतिश्योक्ति होगी। क्योंकि ऐसा नहीं है। वे आज भी हैं। जो एसपीओस् की भर्तियां सलवा जुडूम के चलते करवायी गयी थी। आज उनको लगभग रेग्युलराईज कर दिया गया है। सलवा जुडूम से जुड़े जो लोग सामने आये थे और जिनका प्रकोप रहा और जिनके द्वारा हत्याएं और लूटपाट की घटनाएं सामने आयी थीं। वो सिलसिला अब भी जारी है। मतलब वे सारी स्थिति खत्म नहीं हुई हैं।
मई महीने में एक पीस मार्च हुआ था जिसमें प्रोफेसर यशपाल से लेकर स्वामी अग्निवेश सरीके लोग शामिल थे। उनका विरोध हुआ और इस विरोध को आमलोगो का विरोध बताया गया। लेकिन ये सबको पता था कि ये सरकार की शह पर करवाया जा रहा है। जो सामने आकर इन सबका विरोध कर रहे थे वे सीधे-सीधे सलवा जु़डूम से जुड़े अपराधी तत्व के लोग थे। वे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं और उनका कामकाज उसी स्तर पर चल रहा है।
माओवादियों के नेतत्व में जो आंदोलन वहां चल रहा है। उसे आप किस हद तक जायज ठहराते हैं।
देखिए ये कोई हाल का मुद्दा नहीं है। उन्हें इन इलाकों में काम करते हुए 30 साल हो गए हैं। 90-95 में सबसे पहले इनके खिलाफ कार्रवाई जन जागरण के नाम से शुरू हुई। सरकारी तंत्र इसमें सफल नहीं हुआ। 97-98 में दोबारा उन्होंने कोशिश की। फिर सफल नहीं हुए। 2005 में सलवा जुडूम के नाम पर तीसरा प्रयास किया और इस बार भी सफल नहीं हुए। इसके बाद माओवादियों की पैठ किसी भी सूरत में कम नहीं हुई और अधिक मजबूत हुई है।
इस इलाके से बड़ी संख्या में 644 गांवों से विस्थापन हुआ है। 2005 में सलवा जुडूम शुरू हुआ तो उसमें आदिवासी समाज का वो तबका जुड़ा जिन्हें लगा कि माओवादियों के आने के बाद उनका वर्चस्व खत्म हो गय़ा है। माओवादियों ने जिन जमीदारों की जमीने छीनकर गरीब आदिवासियों में बांट दी थी। ऐसे लोग ने सलवा जुडूम को बनाने में प्रभावी भूमिका निभायी।
लेकिन हैरानी की बात है कि चंद महीनों में ही एक बड़ा तबका सलवा जुडूम से कट गया। अब आप इन लोगों से मिले तो वो बताएंगे कि सलवा जुडूम के नाम पर, माओवादियों को खत्म करने के नाम पर सबसे बड़ा खामियाजा आदिवासियों को ही भुगतना पड़ा। गांव के गांव खाली करवा दिए गए और उनकी जमीने ले ली गयी। अब जमीने कॉरपोरेशन को देने की कोशिश की जा रही है। तब लोगों को समझ में आने लगा कि ये सब सलवा जुडूम के नाम पर हो रहा है।
दूसरी बात की सलवा जुडूम के चलते जो साढे तीन लाख लोग विस्थापित हुए। उनके बारे में हमको बताया गया कि 56 हजार लोगों को सलवा जुडूम कैंपस् में रखा गया है। 30 से 35 हजार लोगों ने उड़ीसा और खासतौर से आंध्र प्रदेश में आश्रय लिया। लेकिन बाकि दो से अढाई लाख लोग कहां गए। वो गायब हो गए क्या? वो लोग माओवादियों के पास गए, जिन्होंने दोबारा लोगों को गांव में बसाने में मदद की। मेरा मतलब है कि सलवा जुडूम का नकारात्मक प्रभाव रहा और उससे प्रभावित लोंगों के बीच माओवादियों का आंदोलन ज्यादा लोकप्रिय हुआ।
इस संघर्ष के तीव्र और उग्र होने के क्या कारण हैं?
1991 में जब बस्तर के दण्यकारण्य में पहली बार दमन हुआ। उस वक्त स्पष्ट हो गया था कि अगर ये ज्यादा मुस्तैदी से अपने आप को तैयार नहीं करते तो ये खत्म हो जाएंगे। क्योंकि सरकारी पक्ष बहुत शक्तिशाली है।
जब हम बात करते हैं माओवादी आंदोलन की तो लगता है कि ये चारों तरफ फैला हुआ है। और 223 जिलों में हरेक के पास बंदुक है। हजारों की तादाद में कार्यकर्त्ता उनकी सेना के साथ जुड़ें हैं। लड़ रहे हैं। वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। 2006 तक सरकार का मानना था कि कुल 10 हजार काडर है। आज ये मान लीजिए दोगुने हो गए होंगे। 2006 तक उनके शस्त्र 8 से 10 हजार थे वे भी दोगुने हो गए होंगे।
आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इंटरनेशनल कैंपेन ऑफ स्मॉल आर्मस का मानना है कि इस मुल्क में प्राइवेट लोगों के पास चार करोड़ शस्त्र हैं। मतलब संवर्ण और अपर क्लास के लोगों के पास। जिस मुल्क में इतनी असमानता है। इतना दमन-शोषण है, तो ऐसे में माओवादियों के पास हथियार हैं भी तो सत्ता के सामने कौन सी बड़ी चुनौती है। कहीं ना कहीं सब कुछ बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
जो लोग अपनी सरकार को अपनी जमीनें देने का विरोध कर रहे हैं। अगर उस विरोध को खत्म करना है तो माओवादियों को कमजोर करना होगा। अब जो लोग बात करते हैं कि माओवादी उग्र क्यों हो रहे हैं। वे सशस्त्र क्रांति की तरफ क्यों जाते हैं। तो हम इन सवालों को भूल जाते हैं कि आखिरकार आपने उनके सामने रास्ता ही क्या छोड़ा है। माओवादियों को कमजोर करना सरकार की जरुरत इसलिए बन गई है कि सरकार का सबसे ज्यादा प्रतिरोध अगर कहीं है तो उन इलाकों में जहां माओवादियों का प्रभाव है।
प्रधानमंत्री ने कई बार माओवाद को अंदरूनी सुरक्षा के लिए खतरा बताया है और सरकार सेना के इस्तेमाल पर विचार कर रही है। इसके क्या परिणाम होंगे?
दुखद ही होंगे। यही सरकार है जिसने पिछले 60 सालों में हम लोगों को सीख दी है कि पाकिस्तान हमारा सबसे बड़ा दुश्मन मुल्क है। यही सरकार और यही प्रधानमंत्री संसद के मंच से ये कहते हैं कि पाकिस्तान से युद्ध विकल्प नहीं है। हम संवाद से आपसी मुद्दों को सुलझ सकेंगे। युद्ध कोई रास्ता नहीं होता। 60 साल तक जिसको आपने अपना सबसे बड़ा दुश्मन माना, आज आप खुले आम कहने को तैयार है कि उसके साथ युद्ध कोई विकल्प नहीं है।
अब हम अपने प्रधानमंत्री से सवाल पूछते हैं कि अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध क्यों एक विकल्प नजर आता है। क्या ये माओवादी पाकिस्तान से भी बड़ा खतरा हैं। सेना भी विफल हो गई तब क्या मिसाईल इस्तेमाल करेंगे। मिसाईल विफल हो गयी तो क्या परमाणु बम इस्तेमाल करेंगे।
पिछले दिनों सरकार की तरफ से माओवादियों से बातचीत की पेशकश की गई। वे आगे क्यों नहीं बढ़ पायी। इसके लिए दोषी कौन है?
अभी आखिरी बार चिदंबरम साहब ने स्वामी अग्निवेश को एक चिट्ठी भेजी कि आप इसमें हस्तक्षेप करें। स्वामी जी जेल में बंद माओवादी नेताओं से बात करने की बजाए यहां-वहां बंगले झांक रहे हैं। जब सरकार को पता ही नहीं कि किससे बात करनी चाहिए और मध्यस्थता के लिए किससे अप्रोच करना चाहिए। फिर इसे कैसे गंभीरता से ले सकते हैं। स्वामी जी को कुछ पता ही नहीं है।
अरे! जब सरकार ने आपसे मध्यस्थता के लिए कहा है तो वे गृह मंत्रालय से ये नहीं कह सकते कि आप जेल में बंद माओवादी नेताओं से हमारी मीटिंग फिक्स करवाओ, हम उनसे मिलना चाहते हैं। वे तो ये कहते फिर रहे हैं कि ये तो बड़ा लंबा मामला है। अदालत जाना पड़ेगा। अदालत की परमिशन के बिना तो ये हो ही नहीं सकता। सरकार ने ऐसे व्यक्ति को सामने रखा है जिसे कुछ पता ही नहीं। इसलिए मुझे लगता है कि सरकार बातचीत के लिए गंभीर नहीं है।
माओवादियों के ऐसे हमले जिनमें निर्दोष नागरिक और पब्लिक प्रोपर्टी को अपना निशाना बनाते हैं। इन घटनाओ से दूर दूर तक गलत संदेश गया है कि नक्सली विकास विरोधी हैं। आप इसे किस नजर से देखते हैं।
ये समस्या बहुत गंभीर है। इसमे कोई दो राय नहीं कि दोनों तरफ से बहुत गलतियां हुई हैं। मेरा ये मानना है कि अगर माओवादी समझे नहीं और इन गलितयों से वे सीख नहीं लेते तो लोग उनसे कट जाएंगे। और बिना लोगों के कोई आंदोलन चल नहीं सकता। ये तो उन्हें खुद सोचने की जरूरत है कि आप क्या करना चाहते हैं। माफी मांग लेने से काम नहीं होता। अगर आपको लगता है कि वाकैई आप से गलती हुई है तो वे गलती दोबारा नहीं होना चाहिए।
माओवादी अगर ये नहीं समझते कि उनके ऊपर कितना बड़ा दारोमदार है और वे ऐसी गलतियां करते रहे तो खत्म हो जाएंगे। सबसे चिंता की बात है कि वे जिस शोषित जनता के लिए लड़ रहे हैं, अगर वो जनता कट गई तो सब खत्म। फिर उनके लिए सिर उठाने के लिए जगह नहीं। सामाजिक कार्यकर्त्ता होने के नाते हमने बार-बार आग्रह किया है कि आप अनुशासन मेंटेन नहीं करते, अपराधों मे कमी नहीं करते तो जनता को बेइज्जत मत करिए।
आखिरी सवाल कि बस्तर में आपने ऐसा क्या देखा जो शहरों में बैठे लोग, नेता और मीडिया नहीं देख पाता।
जो देखकर आया और जिसे देखकर आश्चर्य होता है। जो काम उन्होंने किया और जिसके बारे में हम बहुत नहीं जानते। कहा जाता है कि माओवादी विकास विरोधी हैं। बकवास। 30 सालों में जो उनका अभूतपूर्व योगदान रहा है। माओवादियों ने सीमित संसाधनों के आधार पर वैकल्पिक विकास कर दिखाया है। उनके ऊपर हमले हो रहे हैं, उनका दमन हो रहा है। ये सब झेलते हुए इस इलाके में विकास किया है। वो देखने लायक है। 30 साल से वे इन इलाकों मे काम कर रहे हैं लेकिन इस बारे में बहुत ज्यादा लिखा नहीं गया। तमाम डिसक्शन, चर्चा, सेमिनार, वर्क शॉप में वैकल्पिक विकास की बात की जाती है, वो माओवादियों ने कर दिखाया है।
सबसे बड़ी चीज जो मुझे लगी वो ये उन लोगों के बीच जिन्हें सत्ता-राज्य भूल गया है, उन्हें संगठित करके विकास करना। ये समाज को बदलने के लिए बहुत बड़ी उपलब्धी है। छोटे-छोटे मोबाईल स्कूल, मोबाईल हैल्थ क्लिनिक्स, जमीन का वितरण, सिंचाई के साधन सामने लाएं हैं। वे एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं कि किस तरह की चीज बोई जानी चाहिए, उसके लिए क्या जरूरत है, औरतों को प्रोत्साहित करना, समाज में उनकी भागीदारी को बढ़ाना और सोशल रिप्रेशन को डेमोक्रेटाइज करना। किस किस स्तर पर उन्होंने काम नहीं किया है। जिस देखकर मैं सबसे ज्यादा आर्कषित हुआ वो यही थी। जिसके बारे में बहुत कम लिखा गया। अफसोस!
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