मेरे घर पर सुबह-शाम ढ़ेरों बंदर स-परिवार बिन बुलाए मेहमान की तरह आ टपकते हैं। बरामदें में डेरा जमा लेते हैं, तोड़फोड़ करते हैं, घूरते और खिसियाते हैं। थोड़ी देर तक हम सबको आतंकित कर चले जाते हैं। ऐसा लगता है कि वे अपना विरोध दर्ज़ कराने आए थे। आसपास के सभी लोग उनसे परेशान हैं। अक्सर खबरों में देखने, सुनने और पढ़ने को मिलता है कि बंदर, तेंदुए, बाघ या दूसरे जंगली जानवर रिहाइशी इलाको में घुस आए। ऐसी खबरें कई बार सामने आ चुकी हैं। बस्तियों में घुस आये भालू, बाघ और तेंदुए मार दिए जाते हैं।
इन जानवरों पर आरोप लगाए जाते हैं कि वे इंसानी बस्तियों पर हमला कर उनके भेड़-बकरी उठा ले जाते हैं। कई बार तो जंगली जानवर और बंदरों ने इंसानों पर भी हमला कर दिया है।
आदी मानव तो जंगलों से निकल आया और शहरों-बस्तियों में रहने का आदी हो गया। उसने अपनी सहुलियत के हिसाब से कंक्रीट के जंगल बसा लिये। इसके लिए उसने हरे भरे जंगलों को उजाड़ दिया। दरअसल इंसान ने जंगलों का सफाया कर जंगली जानवरों के घरों पर कब्जा कर लिया है। ऐसे में कई जंगली जानवर घर से बेघर हो गए।
जब जानवर अपने घरों की तलाश में इंसानी इलाको का रुख कर रहे हैं तो हम उनपर बस्तियों में घुस आने का आरोप लगा रहे हैं। सच तो ये है कि इंसान, जानवरों के घरों में घुस आया है और सदियों से उनपर कब्जा कर रखा है।
इन दिनों राजस्थान के अजमेर जिले में एक तेदुएं ने आतंक फैला रखा है। तेदुएं के डर से गांव के लोगों की रातों की नींद उड़ी हुई है। ये तेदुआ अब तक एक दर्जन से ज्यादा जानवरों को अपना शिकार बना चुका है।
कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के जैतपुर थाने के खोरी गाँव में भालू के हमले से दो ग्रामीणों की मृत्यु हो गई और तीन घायल हो गए। इससे गुस्साए लोगों ने भालू को मार डाला। ऐसी मिसाल ढ़ेरों हैं।
दिल्ली और दिल्ली के आसपास के कई इलाकों में तो बंदरों के आतंक से लोग परेशान हैं। दरअसल पिछले कुछेक सालों से जंगली जानवर रिहाइशी इलाको की तरफ आने लगे हैं। कई जगहों पर बंदरों ने कब्जा कर रखा है। 40-50 बंदरों का समुह इन इलाकों में ऊधम मचाने और आतंक फैलाने के लिए बदनाम है। वे अक्सर घरों से चीजे उठा ले जाते हैं, तोड़फोड़ करते हैं और बच्चो को काट लेते हैं।
जंगली जानवर इंसानों से युद्ध तो नहीं कर सकते लेकिन वे छिटपुट वारदातों को अंजाम देकर ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि अब उनके पास जंगल खत्म हो चुके हैं। पृथ्वी पर रहने के लिए उन्हें भी जगह चाहिए।
बंदरों ने तो अपनी आवाज इंसानों के राष्ट्रपति तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रपति भवन को भी घरे रखा है। लेकिन उनकी गुहार वहां भी सुनने वाला कोई नहीं।
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