बृहस्पतिवार, 8 जुलाई 2010

पेट्रोल की कीमत का राज


इन दिनों महंगाई सातवें आसमान पर है। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक ने महंगाई कम करने के नाम पर हाथ खड़े कर रखे हैं। क्या-क्या महंगा है इससे गिनाने की कतई जरुरत नहीं।

तमाम राजनीतिक पार्टियां महगाई के मुद्दे पर पूरा ड्रामा करती हैं, संसद ठप करती हैं और आरोप प्रत्यारोप लगाती है। मीडिया भी इस मुद्दे पर खबरें बनाने से नहीं चूकता।

ये सब जानते हैं कि जब पेट्रोल महंगा होता है तो इसका असर महंगाई पर पड़ता है। कई जरुरी उत्पाद महंगे हो जाते है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में पेट्रोल महंगा क्यों है।

सरकार ने पिछले ही दिनों उसके दाम फिर क्यों बढ़ा दिए हैं। तमाम राजनीतिक पार्टियां, अखबार, न्यूज चैनल, और बहसों में उलझे विशेषज्ञ अपनी जनता को आसान भाषा में ये कभी नहीं बताते की पेट्रोल के असल दाम क्या हैं?

इन दिनों एक लीटर पेट्रोल 54.87 रुपये में मिलता हैं। क्या आप जानते हैं कि तेल की वास्तविक कीमत क्या है? यदि नहीं तो जान लीजिये, एक लीटर पेट्रोल कीमत महज 16.50 रुपये ही है। इसके उपर की जो कीमत आप देते हैं वे सब टैक्स है।

देश में एक लीटर पेट्रोल पर 11।80 रुपये केंद्रीय कर, 9।75 रुपये एक्साइज ड्यूटी, चार रुपये सेस के साथ ही प्रदेश सरकार आठ रुपये टैक्स लेती है। यह सब मिलाकर एक लीटर पेट्रोल की कीमत होती है, लगभग 48.05 रुपये। बाकी का पैसा कहां जाता है, उपभोक्ता को मालूम ही नहीं।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी स्टेट काउंसिल द्वारा जारी आंकड़ों में तेल के पीछे चल रहे टैक्स के खेल पर निशाना साधा गया है।

हैरानी तो ये जानकर होती है कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में एक लीटर पेट्रोल 26 रुपये लीटर, बांग्लादेश में 22 रुपये लीटर, नेपाल में 24 रुपये लीटर, अफगानिस्तान में 36 रुपये लीटर, बर्मा में 30 रुपये लीटर, क्यूबा में 19 रुपये लीटर और कतर में एक लीटर पेट्रोल 30 रुपये में मिल रहा है।

उधर, लखनऊ पेट्रोलियम ट्रेडर्स एसोसिएशन भी प्रत्येक लीटर पेट्रोल पर काफी टैक्स लगने की बात कहता है। एसोसिएशन सदस्यों का कहना है कि तेल कंपनियों द्वारा पेट्रोल पंप अथवा डीलर को जारी किए जाने वाले बिलों में सारे टैक्स शामिल रहते हैं और इनका ब्योरा नहीं रहता है। इन बिलों के ऊपर डीलर प्रति लीटर पेट्रोल करीब 1.08 रुपये तथा प्रति लीटर डीजल 67 पैसे कमीशन लेता है।

अब आप सोचिए कि अगर तमाम कर कम कर दिए जाएं तो महंगाई अपने आप ही कम हो जाएगी। लेकिन सरकारों को इससे कतई मतलब नहीं कि उसकी जनता पर कितना बोझ पड़ रहा है। वे तो अपनी जनता से कर के नाम पर ज्यादा से ज्यादा वसूली कर लेना चाहती है।

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