बुधवार, 1 सितम्बर 2010

ये घड़ी...

1
चुभती-चुभती सी ये घड़ी है,
हवा, पेड़ की शाखा पर पड़ी है.
वहां वो इंतजार में खड़ी है,
यहां जिंदगी, मौत से लड़ी है.

2
मेरा शरीर एक ज्वालामुखी है
जिसमें हर पल भावनाएं उबलती हैं
और एक दिन वो चरम पर होती हैं
फिर एक ज्वाला निकलती है
भावनाएं आग की लपटों की तरह
धधकती हुई बारह निकलती है
मैं झुलस जाता हूं
अपनी ही इन लपटों में
जब एकदम शांत हो जाता हूं
                                                           जैस सुसुप्त है कोई ज्वालामुखी..

1 टिप्पणियाँ:

  1. "...मेरा शरीर एक ज्वालामुखी है
    जिसमें हर पल भावनाएं उबलती हैं..."

    क्या बात है!

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