बृहस्पतिवार, 16 दिसम्बर 2010

आदत

कुछ इस तरह से जिन्दगी हो गई है,
कि सांस लेता हूं तो दम घुटता है।

सालों से जिन्दगी का हर पन्ना पलटा है,
अब तो पूरी किताब खत्म हो गई है।

घर से काम पर, काम से घर आना,
जीने की यही आदत-सी हो गई है।

उनसे मिल के अभी तो लौटा हूं, निगम,
लो ये हसरत फिर से जवां हो गई है।

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