ये तस्वीर एक बड़े दैनिक अखबार में प्रकाशित हुई है। इसे देखकर ही हम और आप मौजूदा सरकारी शिक्षा व्यवस्था का अंदाजा लगा सकते हैं। इस तस्वीर में जर्जर अवस्था में दिख रही इमारत हाथरस के नवीपुर प्राथमिक विद्यालय की इमारत है। जहां ना बिजली है, ना पानी। इस स्कूल में मौसम साफ होने पर ही खुले आसमान के नीचे पढ़ाई होती है। मौसम का मिजाज बिगड़ा तो बच्चो की छुट्टी कर दी जाती है। नियति देखिए.... ऐसे है दूरदराज के गांवो के स्कूलों की इमारतों के हालात और वहीं शहरों में माॅल्स के शौचालय भी इनसे बेहतर और सुंदर दिखते हैं। ये तस्वीर सर्व शिक्षा अभियान, मीड डे मिल, सब पढ़ो-सब बढ़ो, आओ स्कूल चले हम, मुफ्त किताबे-वर्दी, शिक्षा का अधिकार जैसे योजनाओं, नारो और अधिकारों के मुह पर जोरदार तमाचा है।
गरीब बच्चों को सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा और व्यवस्था मुहैया कराने में सरकारें नाकाम रही हैं। अरबो रूपए खर्च करने के बाद भी सरकारी स्कूलों और शिक्षा के स्तर में गुणवत्तापूर्ण बदलाव नहीं कर पा रही र्है, तो इससे अच्छा है कि गरीब का बच्चा अनपढ़ ही रहे। बेचारा स्कूल जाने का साहस भी करता है फिर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित ही रहता है।
गरीब बच्चों को सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा और व्यवस्था मुहैया कराने में सरकारें नाकाम रही हैं। अरबो रूपए खर्च करने के बाद भी सरकारी स्कूलों और शिक्षा के स्तर में गुणवत्तापूर्ण बदलाव नहीं कर पा रही र्है, तो इससे अच्छा है कि गरीब का बच्चा अनपढ़ ही रहे। बेचारा स्कूल जाने का साहस भी करता है फिर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित ही रहता है।
ऐसी घटिया शि़क्षा उपलब्ध कराकर कम से कम केन्द्र और राज्य सरकारें बेवजह की वाहवाही तो ना लूटे। क्योंकि सरकारे 60 सालों से नई नई शिक्षा योजनाओं के नाम पर हजारों रूपए खर्च तो कर देती है लेकिन ना गरीब के स्कूलों मे ना बिजली होती है ना पानी, ना पंखे और ना टाट-पट्टी। इसके बावजूद भी शिक्षा पर सरकारी हिसाब-किताब लाखों में। मौजदूा सरकारी स्कूलों में बच्चे पांचवी तक पढ़ने के बाद भी किताबे नहीं पढ़ पाते, मतलब अनपढ़ ही रह जाते है।
फिर हर दस साल बाद सरकारे बताती है कि देश में शि़िक्षत लोगों की दर बढ़ रही है। हैरान और परेशान करने वाली बाते है। अपना माथा फोड़ो, सर फोड़ो सरकारों के कान पर जूं नहीं रेंगने वाली। 60 सालों से सरकारी स्कूल नहीं सुधरे, आने वाले 50 सालो तक भी नहीं सुधरेंगे। बेवजह आशावादी होने का कोई अर्थ नहीं होता।
फिर हर दस साल बाद सरकारे बताती है कि देश में शि़िक्षत लोगों की दर बढ़ रही है। हैरान और परेशान करने वाली बाते है। अपना माथा फोड़ो, सर फोड़ो सरकारों के कान पर जूं नहीं रेंगने वाली। 60 सालों से सरकारी स्कूल नहीं सुधरे, आने वाले 50 सालो तक भी नहीं सुधरेंगे। बेवजह आशावादी होने का कोई अर्थ नहीं होता।
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