सोमवार, 21 नवम्बर 2011

संसद की कार्रवाई के लिए बने कानून..

इस बार भी संसद का शीतकालीन सत्र अखबारों और तमाम न्यूज़ चैनलों की हैडलाईन्स बनेगा। संसद का हरेक सत्र में उसके हंगामे, पक्ष-विपक्ष की चीख-चिल्लाहट और बिना बहस के विधेयक पारित होने की खबर ही बनायी जाती हैं। हमारा किताबी ज्ञान कहता है कि संसद देश की सर्वोच्च संस्थाओं में से एक है। जहां देश और जनता के लिए चिंता की जाती हैं, उनके लिए कानून बनाए जाते हैं, देश की व्यवस्था सुचारू रूप से चले इसपर विचार किया जाता है, कानून बनने से पहले विधेयक पर घंटो चर्चा होती है,, खास विषयों पर सलाह-मशविरा होता है। तमाम मंत्री अपने-अपने मंत्रालयों से संबंधित जानकारी सदन के समक्ष रखते हैं, राजनीतिक दल अपनी-अपनी बात सदन में उठाते हैं, देश-विदेश, रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि-आदि विषयों पर गंभीर बहस होती है। और इस तरह से संसद की कार्रवाई संपन्न होती है। लेकिन हकीकत बिल्कुल इसके उलट है।

स्कूल-काॅलेज की किताबों में लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों की विधानसभाओं के बारे में जो कुछ पढ़ा था, सब आज झूठा निकला है। पिछले 10 सालों में संसद और विधानसभाओं की कार्रवाई में हंगामा, शोरशराबा, मारपीट और गालीगलौच खूब देखने को मिला है। क्या ये सदन की कार्रवाई का सबसे अहम हिस्सा है?

देश के लिए कानून और व्यवस्था बनाने वाली संसद को आज स्वयं ही एक सख्त कानून की जरूरत है। जिससे लोकसभा और राज्यसभा की कार्रवाई सुचारू रूप से चल सके और गंभीर विषयों ंपर अच्छी बहसे हो सकें। संसद की कार्रवाई के लिए एक सख्त कानून होना चाहिए। जिसके मुताबिक-
  1. संसद की कार्रवाई के दौरान हंगामा और नारेबाजी पूरी तरह वर्जित हो,
  2. मंत्री और सांसद अपनी बारी आने पर ही बोले,
  3. अगर किसी मंत्री या सांसद के बयान से दूसरा सहमत नहीं है तो असहमति प्रकट करने के लिए सांसद को एक मिनट का मौका दिया जाए।
  4. संसद के अंदर किसी भी तरह की हिंसा पर सांसद को बर्खास्त किया जाए,
  5. संसद की कार्रवाई सत्र. के दौरान सुबह 11 बजे से शाम 8 बजे तक नियमित रूप से चले,
  6. संसद की कार्रवाई सिर्फ आपात स्थिति में ही स्थगित की जाए,
  7. शोरशराबा, हंगामा की वजह से हर रोज कार्रवाई को स्थगित नही किया जाएगा,
  8. सदन में सांसदों की मौजूदगी को सुनिश्चित किया जाए,
  9. हर राजनीतिक पार्टी की सांसदों की उपस्थिति संख्या तय की जाए,
  10. कोई भी विधेयक बिना चर्चा के पारित नहीं किया जा सकता,

ऐसे तमाम उपाय करके संसद की कार्रवाई को सुचारू रूप से चलाया जा सकता हैं। जिससे बिना बहस किए विधेयकों को पास करने की परंपरा पर भी विराम लगेगा। हर साल सदन की कार्रवाई पर बेवजह, बिना बहस के, अव्यवस्थित सदन की कार्रवाई पर करोड़ो रूपए स्वाह किए जा रहे है। कानून बनाकर देश को चलाने वालो को एक बार नहीं सौ बार अपनी गिरेबां में झांकना चाहिए। ताकि हमारी ये तमाम संस्थाएं सुचारू रूप से चल सके और राजनेताओं के आचरण में गंभीरता झलके।

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