शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

एक पल में..

कई अक्षर गिर गए हैं,
कई
शब्द टूट गए है,
कई लकीरें मिट गई हैं,
कई पन्ने पलट गए हैं,
एक पल में,
बहुत कुछ
बदल-सा गया है, दोस्तों...

सोमवार, 21 नवम्बर 2011

संसद की कार्रवाई के लिए बने कानून..

इस बार भी संसद का शीतकालीन सत्र अखबारों और तमाम न्यूज़ चैनलों की हैडलाईन्स बनेगा। संसद का हरेक सत्र में उसके हंगामे, पक्ष-विपक्ष की चीख-चिल्लाहट और बिना बहस के विधेयक पारित होने की खबर ही बनायी जाती हैं। हमारा किताबी ज्ञान कहता है कि संसद देश की सर्वोच्च संस्थाओं में से एक है। जहां देश और जनता के लिए चिंता की जाती हैं, उनके लिए कानून बनाए जाते हैं, देश की व्यवस्था सुचारू रूप से चले इसपर विचार किया जाता है, कानून बनने से पहले विधेयक पर घंटो चर्चा होती है,, खास विषयों पर सलाह-मशविरा होता है। तमाम मंत्री अपने-अपने मंत्रालयों से संबंधित जानकारी सदन के समक्ष रखते हैं, राजनीतिक दल अपनी-अपनी बात सदन में उठाते हैं, देश-विदेश, रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि-आदि विषयों पर गंभीर बहस होती है। और इस तरह से संसद की कार्रवाई संपन्न होती है। लेकिन हकीकत बिल्कुल इसके उलट है।

स्कूल-काॅलेज की किताबों में लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों की विधानसभाओं के बारे में जो कुछ पढ़ा था, सब आज झूठा निकला है। पिछले 10 सालों में संसद और विधानसभाओं की कार्रवाई में हंगामा, शोरशराबा, मारपीट और गालीगलौच खूब देखने को मिला है। क्या ये सदन की कार्रवाई का सबसे अहम हिस्सा है?

देश के लिए कानून और व्यवस्था बनाने वाली संसद को आज स्वयं ही एक सख्त कानून की जरूरत है। जिससे लोकसभा और राज्यसभा की कार्रवाई सुचारू रूप से चल सके और गंभीर विषयों ंपर अच्छी बहसे हो सकें। संसद की कार्रवाई के लिए एक सख्त कानून होना चाहिए। जिसके मुताबिक-
  1. संसद की कार्रवाई के दौरान हंगामा और नारेबाजी पूरी तरह वर्जित हो,
  2. मंत्री और सांसद अपनी बारी आने पर ही बोले,
  3. अगर किसी मंत्री या सांसद के बयान से दूसरा सहमत नहीं है तो असहमति प्रकट करने के लिए सांसद को एक मिनट का मौका दिया जाए।
  4. संसद के अंदर किसी भी तरह की हिंसा पर सांसद को बर्खास्त किया जाए,
  5. संसद की कार्रवाई सत्र. के दौरान सुबह 11 बजे से शाम 8 बजे तक नियमित रूप से चले,
  6. संसद की कार्रवाई सिर्फ आपात स्थिति में ही स्थगित की जाए,
  7. शोरशराबा, हंगामा की वजह से हर रोज कार्रवाई को स्थगित नही किया जाएगा,
  8. सदन में सांसदों की मौजूदगी को सुनिश्चित किया जाए,
  9. हर राजनीतिक पार्टी की सांसदों की उपस्थिति संख्या तय की जाए,
  10. कोई भी विधेयक बिना चर्चा के पारित नहीं किया जा सकता,

ऐसे तमाम उपाय करके संसद की कार्रवाई को सुचारू रूप से चलाया जा सकता हैं। जिससे बिना बहस किए विधेयकों को पास करने की परंपरा पर भी विराम लगेगा। हर साल सदन की कार्रवाई पर बेवजह, बिना बहस के, अव्यवस्थित सदन की कार्रवाई पर करोड़ो रूपए स्वाह किए जा रहे है। कानून बनाकर देश को चलाने वालो को एक बार नहीं सौ बार अपनी गिरेबां में झांकना चाहिए। ताकि हमारी ये तमाम संस्थाएं सुचारू रूप से चल सके और राजनेताओं के आचरण में गंभीरता झलके।

शनिवार, 19 नवम्बर 2011

बदल गया बचपन..

मुझे अपना बचपन बखूबी याद है। आज जब अपने आसपास के बच्चों को देखता हूं तो हैरान-परेशान हो जाता है। ज़माना कितना बदल गया है। बच्चों का बचपन कितना बदल गया है। हम जब छोटे थे तो हमारा ज्यादातर समय पढ़ाई के अलावा  कंचे खेलने, पिट्ठु खेलने, कबड़्डी और खो-खो खेलने या फिर छुपन-छुपायी खेलने में गुजरता था। टीवी की महामारी उस समय फैली नहीं थी। खेल से उकता जाते तो नंदन, चंदामामा, चंपक और चाचा चैधरी, पिंकी, बिल्लू, लम्बू-छोटू की काॅमिक्स पढ़ते। ये हमारा बचपन था।

आजकल के बच्चों इन खेलों और किताबें से बेहद दूर है। मौजूदा दौर के बच्चें टीवी महामारी के बाद इंटरनेट के बुखार से इस कदर पीड़ित है कि उनका ज्यादातर समय कंप्यूटर के सामने बीत रहा है। वे इतने आधुनिक हो गए है कि वे ज़मीनी खेल से कोसो दूर कम्प्यूटर पर खेलते कूदते है, वहीं खाते-पीते है और वहीं उनके नए नए दोस्त भी बनते हैं। क्या आजकल के बच्चों का बचपन कहीं खो गया है या फिर बचपन का स्वरूप ही बदल गया है?

अब छोटे-छोटे बच्चों के मुंह से ‘‘तोते को बुखार है....‘‘, ‘‘चंदा मामा दूर के‘‘ जैसे कविताएं याद नहीं होती। इस ज़माने के बच्चों को मैंने कई बार मुन्नी बदनाम हुई.. शीला की जवानी जैसे गाने गुनगुनाते सुना और देखा है। ये बच्चे जब थोड़े से बड़े होते है तो इनका स्वागत होता है सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर। ‘ऑनलाइन सोशल मीडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट की दुनिया में वर्ष 2004 में कदम रखने वाले फेसबुक के सदस्यों की संख्या में 80 करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है. इसमें हर उम्र के लोग शामिल है। 80 करोड़ के इस आंकड़ों में भारतीय बच्चों की संख्या किसी से कम नहीं है। पिछले दो साल में स्कूल जाने वाले शहरों के ज्यादातर बच्चों ने बहुत तेजी से फेसबुक पर अपने अकाउंट खोले है और अपने अकाउंट का रोजाना स्टेटस भी चेक करते हैं। अब उनके पास उतना वक्त नही की वे पारंपरिक खेल खेलें या फिर स्कूली किताबों के अलावा पंचतंत्र पढ़े सके। शायद ही आजकल के 100 में से पांच बच्चें पंचतंत्र की कहानिया पढ़ते होंगे?

भारत में इंटरनेट के प्रयोग में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई हैं। भारत में इंटरनेट के उपभोक्ता मुख्य रूप से युवा पीढ़ी के हैं। भारत में सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स इंटरनेट के कुल उपभोक्ताओं में से 84 प्रतिशत तक पहुंच रही हैं। आखिर हम अपने बच्चों को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं? आखिर क्यों सोने से पहले हम अपने बच्चों को राजा-महाराजी या परियों की कहानी नहीं सुनाते? जैसे यादे हमारी और आपके बचपन की हैं क्या हमारे बच्चे भी अपने बचपन को वैसे ही याद कर पाएंगे? तस्वीर बेहद धूंधली है।

शुक्रवार, 18 नवम्बर 2011

गरीब का बच्चा अनपढ़ ही रहे..

 ये तस्वीर एक बड़े दैनिक अखबार में प्रकाशित हुई है। इसे देखकर ही हम और आप मौजूदा सरकारी शिक्षा व्यवस्था का अंदाजा लगा सकते हैं। इस तस्वीर में जर्जर अवस्था में दिख रही इमारत हाथरस के नवीपुर प्राथमिक विद्यालय की इमारत है। जहां ना बिजली है, ना पानी। इस स्कूल में मौसम साफ होने पर ही खुले आसमान के नीचे पढ़ाई होती है। मौसम का मिजाज बिगड़ा तो बच्चो की छुट्टी कर दी जाती है। नियति देखिए.... ऐसे है दूरदराज के गांवो के स्कूलों की इमारतों के हालात और वहीं शहरों में माॅल्स के शौचालय भी इनसे बेहतर और सुंदर दिखते हैं।

ये तस्वीर सर्व शिक्षा अभियान, मीड डे मिल, सब पढ़ो-सब बढ़ो, आओ स्कूल चले हम, मुफ्त किताबे-वर्दी, शिक्षा का अधिकार जैसे योजनाओं, नारो और अधिकारों के मुह पर जोरदार तमाचा है।

गरीब बच्चों को सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा और व्यवस्था मुहैया कराने में सरकारें नाकाम रही हैं। अरबो रूपए खर्च करने के बाद भी सरकारी स्कूलों और शिक्षा के स्तर में गुणवत्तापूर्ण बदलाव नहीं कर पा रही र्है, तो इससे अच्छा है कि गरीब का बच्चा अनपढ़ ही रहे। बेचारा स्कूल जाने का साहस भी करता है फिर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित ही रहता है। 

ऐसी घटिया शि़क्षा उपलब्ध कराकर कम से कम केन्द्र और राज्य सरकारें बेवजह की वाहवाही तो ना लूटे। क्योंकि सरकारे 60 सालों से नई नई शिक्षा योजनाओं के नाम पर हजारों रूपए खर्च तो कर देती है लेकिन ना गरीब के स्कूलों मे ना बिजली होती है ना पानी, ना पंखे और ना टाट-पट्टी। इसके बावजूद भी शिक्षा पर सरकारी हिसाब-किताब लाखों में। मौजदूा सरकारी स्कूलों में बच्चे पांचवी तक पढ़ने के बाद भी किताबे नहीं पढ़ पाते, मतलब अनपढ़ ही रह जाते है।

फिर हर दस साल बाद सरकारे बताती है कि देश में शि़िक्षत लोगों की दर बढ़ रही है। हैरान और परेशान करने वाली बाते है। अपना माथा फोड़ो, सर फोड़ो सरकारों के कान पर जूं नहीं रेंगने वाली। 60 सालों से सरकारी स्कूल नहीं सुधरे, आने वाले 50 सालो तक भी नहीं सुधरेंगे। बेवजह आशावादी होने का कोई अर्थ नहीं होता।

सोमवार, 23 मई 2011

भट्टा परसौल - एक और पीपली लाईव


कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएड़ा का एक छोटा सा गांव भट्टा परसौल तमाम न्यूज चैनलों पर छाया रहा। फिल्म पीपली लाइव के पीपली गांव की तरह यहां मीडिया का जमावड़ा था। भट्टा परसौल में भी वहीं देखने को मिल रहा था फिल्म हमने फिल्म पीपली लाइव में देखा था। फिल्म की ही तरह भट्टा परसौल के केन्द्र में भी किसान की दशा थी। पीपली लाइव ने जिस तरह से मूल मसले से भटकते मीडिया का दर्शया था भट्टा परसौल में वहीं सब एक बार फिर देखने-सुनने को मिला। पीपली लाइव और भट्टा परसौल दोनो के ही केन्द्र में सरकारी योजनाओं और नीतियों से त्रस्त, बेहाल और लाचार किसान था और है।


7 मई को भट्टा परसौल किसानों के आक्रोश के चलते अचानक सुर्खियों में आया था। किसानों और पुलिस के बीच मुठभेड़ हुई। दो यहां से मरे दो वहां से भी। हर खबर पर नजर रखने का दावा करने वाला मीडिया सुंघता हुआ यहां आ धमका। फिर इस मुद्दे पर राजनीति का दौर चला। तमाम बड़ी राजनीतिक पार्टी के नेताओं ने राजनीति को चमकाने के मकसद से भट्टा परसौल गांव में घुसने के प्रयास किए। लेकिन उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के सुरक्षा के पुख्ता चक्रव्यूह को तोड़ने में सभी नाकामयाब रहे।


इस चक्रव्यूह को 11 मई की तड़के 4 बजे कांग्रेस के अभिमन्यु राहुल गांधी ने फिल्मी स्टाइल में तोड़ दिया। बस यहीं से मीडिया के धुरंधरों ने कमान संभाली। असल मुद्दे का रायता फैलाने में माहिर न्यूज चैनलों ने किसान और उसके आंदोलन को भूलकर राहुल गाथा शुरू कर दी। अब हर चैनल पर राहुल गांधी की सनसनी थी। भट्टा परसौल में राहुल गांधी की खबर को छोड़ कर चैनलों के संपादकों ने सारी छोटी-बड़ी खबर गिरा दी थी। खाटी राष्ट्रवादी होने का दिखाव करने वाला अंग्रेजी चैनल, हरसाल नम्बर वन कहने वाले, अंधविश्वास फैलाने वाले और मनोरंजन चैनलों के कार्यक्रमों के अंश चुराकर अपने कार्यक्रम बनान वाले तमाम हिन्दी न्यूज चैनल गिरगिट की तरह रंग बदलकर राहुलमय हो चुक थे।


इसके बाद किसानों का असल मुद्दा कहीं पीछे छुट गया था। किसानों की जमीन अधिग्रहण के मुद्दे का जितना राजनीतिकरण हुआ उतना ही इसका मीडियाकरण भी हुआ। चैनलों के संपादक के भेजे में किसान मुद्दा नहीं था। खबरों के कोण बदल गए थे। राहुल गांधी भट्टा परसौल में कैसे घुसे? ये सबसे बड़ी खबर थी। राहुल गांधी कड़कती धूप में धरने पर-ये भी खबर थी। राहुल गांधी ने किस थाली में खाना खाया - एक खबरिया चैनल ने ये भी दिखाया। एक हिन्दी के धुरंधर चैनल ने उन लोगों की बातें सुनायी जिनसे राहुल गांधी ने बाते की थी। ये सब देखकर बार बार मेरी आंखों के सामने फिल्म पीपली लाइव के दृश्य आ-जा रहे थे।


राहुल की गिरफ्तारी के बाद टीवी स्क्रिन पर राजनीति करते और आरोप-प्रत्यारोप करते नेता थे, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती थी। इस सब के बीच असल मुद्दा किसान, जमीन अधिग्रहण, उनकी समस्याएं और मांगे गायब थी।


किसी चैनल ने सामाजिक सरोकार के नाम पर किसानों के आंदोलन और जमीन अधिग्रहण के मुद्दे को समझने और समझाने की भरसक कोशिश नहीं की। भट्टा परसौल के बहाने भारत में किसानों की दशा पर विशेष बात नहीं की। कृषि से जुडी सरकारी नीतियों और योजनाओं की बखिया नही उधेडी। जमीन अधिग्रहण विधेयक पर विचार विमर्श नहीं किया। बस इस विधेयक पर थोड़ा से केन्द्र को कोस जरूर दिया। हमारे मीडिया ने बड़ी ही आसानी से खबरों में से किसान को हटाकर राहुल गांधी और राजनीति को विराजमान कर दिया था। और किसी को मालूम भी नहीं चला।


भट्टा परसौल के घटनाक्रम को मीडिया के धुरंधरों ने नौटंकी बनाकर पेश किया। जिस देश की करीब 80 प्रतिशत जनता कृषि और उससे जुड़े कामधंधों से जुड़ी है, जिस देश में 2006 में 17,060 किसानों ने आत्‍महत्‍या की। 2008 में 16,196 किसानों ने मौत को गले लगाया। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड के मुताबिक 2005 से 2009 तक पांच हजार से अधिक किसानों ने सिर्फ महाराष्‍ट्र में आत्‍महत्‍या की। 2005-07 में आंध्र प्रदेश में 1,313 मामले आये, यही नहीं कर्नाटक, हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश से लेकर तमिलनाडु तक हर साल किसान द्वारा आत्‍महत्‍या के मामले दर्ज हो रहे हैं। लोकतंत्र का चैथा स्तंभ इस संवेदनशील मसले पर गंभीरता का परिचय देने में नाकामयाब क्यों रहा? सवाल के जवाब में पूंजीवादी और बाजारीकरण का रोना ना रोए।


उत्तर प्रदेश में विभिन्न किस्म के एक्सप्रेस वे और अन्य परियोजनाओं के लिए किसानो से आठ नौ सौ रुपए वर्ग मीटर की जमीन लेकर व्यापारियों और उद्योगपतियों को बीस हजार रुपए वर्ग मीटर के हिसाब बेचा जा रहा है। फिर आखिर क्यों इस मसले को मीडिया ने ज्यादा तवज्जो नही दी।


पीपली लाईव की तर्ज पर भट्टा परसौल में की खबरों को मीडिया ने इतने सनसनीखेज और नाटकी अंदाज में प्रस्तुत किया कि मूल खबर की संवेदनशीलता और गंभीरता ही खतम हो गयी। ब्रेकिंग और टीआरपी के चक्कर में किसानों की जमीन अधिग्रहण की मूल समस्या के साथ किसी भी चैनल की खबर न्याय नहीं कर पाई। हिन्दी अंग्रजी के सभी न्यूज चैनल राजनैतिक दाव-पंेच और राहुल गांधी को लाईव दिखाने के चक्कर में इस कदर उलझ गए थे कि मुख्य किरदार किसान का भूल गए थे।


पीपली लाईव ने न्यूज रूम की हकीकत, इस धंधे की मजबूरी और असल मुद्दे से भटकने की मीडिया की आदत को जिस तरह से पेश किया था वही सब भट्टा परसौल गांव में हुई मीडिया कवरेज में देखने को मिला।